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राष्ट्रीय

अयोध्या में उड़ीं नियमों की धज्जियां! साउथ के मंदिर में कैसे होती है चढ़ावे की सुरक्षा? फुलप्रूफ सिस्टम

Updated on Friday, July 10, 2026 15:46 PM IST

अयोध्या के भव्य राम मंदिर में हर दिन करोड़ों की आस्था उमड़ रही है, लेकिन हाल ही में दान पेटियों से हुई रुपयों की चोरी ने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। SIT की जांच में यह साफ हो गया है कि चढ़ावे की गिनती के लिए तय किए गए नियमों (SOP) की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं, जिसका फायदा उठाकर आरोपियों ने भगवान के खजाने में ही सेंध लगा दी। इस बड़े खुलासे और मंदिर प्रशासन में हुए भारी फेरबदल के बाद, अब पूरे देश में दक्षिण भारत के तिरुपति बालाजी और पद्मनाभस्वामी जैसे प्रसिद्ध मंदिरों के 'फुलप्रूफ' सिस्टम की चर्चा तेज हो गई है। हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर साउथ के मंदिरों में दान की सुरक्षा और गिनती का वो कौन सा अचूक मॉडल है, जहां चोरी करना तो दूर, बिना जेब वाले कपड़ों और त्रि-स्तरीय चेकिंग के कारण परिंदा भी पर नहीं मार सकता? आइए समझते हैं दक्षिण भारत के मंदिरों का वो सख्त नियम, जिसे अब अयोध्या में भी लागू करने की जरूरत महसूस हो रही है।


क्या है पूरा मामला और कैसे खुली पोल?
जून के पहले हफ्ते में राम मंदिर में दान की गिनती में कुछ गड़बड़ियों की बात सामने आई थी। इसके बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की सिफारिश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत एक SIT (विशेष जांच दल) का गठन किया। SIT को शुरुआती जांच में ही गबन के पुख्ता सबूत मिल गए। इसके बाद एफआईआर दर्ज की गई और मंदिर की दान गिनती प्रक्रिया से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

SIT जांच में क्या-क्या मिला? चोरी के पैसों से खरीदी कार और गहने
गिरफ्तार किए गए आरोपियों से जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की, तो कई अहम सुराग हाथ लगे। पुलिस ने देर रात कई ठिकानों पर छापेमारी की और नकदी, सोने के आभूषण और यहां तक कि एक कार भी बरामद की।

अनुकल्प (आरोपी): इसके पास से 20,000 रुपये नकद, एक सोने की चेन, एक मोबाइल फोन और पिता के नाम पर खरीदी गई एक नई मारुति डिजायर कार बरामद हुई।

लवकुश (आरोपी): इसने चोरी के पैसों से अपनी पत्नी को एक सोने का लॉकेट गिफ्ट किया था, जिसे पुलिस ने बरामद कर लिया है। साथ ही इसके पास से 38,000 रुपये नकद भी मिले।

करुणेश (आरोपी): इसके पास से 15,000 रुपये की नकदी बरामद हुई।

जांच में यह भी सामने आया है कि ये आरोपी चोरी किए गए पैसों को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवा रहे थे, ताकि काले धन को सफेद किया जा सके।


किन नियमों (SOP) की उड़ाई गई धज्जियां?
SIT की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर तय नियमों का पालन होता, तो यह चोरी संभव ही नहीं थी। जानिए वे कौन से नियम थे, जिन्हें जानबूझकर नजरअंदाज किया गया:


नियम था कि दान गिनने वाले SBI के अधिकारियों को हर महीने बदला जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
दान पेटी को खोलने से लेकर गिनती के कमरे को खोलने और बंद करने तक का काम ट्रस्ट और बैंक के अधिकारियों की मौजूदगी में होना था, जिसमें भारी लापरवाही बरती गई।
नियम के मुताबिक, गिनती वाले कमरे में जाने वाले किसी भी कर्मचारी को गहने (सोना-चांदी) पहनने की मनाही थी। उन्हें बिना यूनिफॉर्म के अंदर नहीं जाना था और आते-जाते वक्त गार्ड्स द्वारा उनकी कड़ी तलाशी ली जानी थी। लेकिन इन सुरक्षा मानकों में ढील दी गई।
ट्रस्ट की जिम्मेदारी थी कि वह पूरी गिनती प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी रखे और पारदर्शिता बनाए रखे, लेकिन यहां भी चूक हुई।


VIP पास के नाम पर भी चल रहा था बड़ा 'खेल'
दान के पैसों की चोरी के साथ-साथ VIP दर्शन के नाम पर भी एक बड़ा रैकेट सामने आया है। SIT जांच में पता चला है कि ट्रस्टियों और वरिष्ठ पदाधिकारियों की डिजिटल आईडी का जमकर दुरुपयोग किया गया।

गिरफ्तार किए गए आरोपियों में से एक, टीनू यादव ने इस लूपहोल का फायदा उठाकर सैकड़ों अनधिकृत VIP दर्शन पास बना डाले। आरोप है कि कुछ बड़े पदाधिकारियों के करीबी लोग VIP पास जारी करने के नाम पर अवैध रूप से लाखों रुपये कमा रहे थे।


मंदिर प्रशासन में हुए बड़े बदलाव
इन घटनाओं के बाद मंदिर प्रशासन ने सख्त कदम उठाए हैं। पूर्व महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा और विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव की वे डिजिटल आईडी निष्क्रिय कर दी गई हैं, जिनसे VIP पास बनते थे। अब इन आईडी के जरिए कोई 'सुगम' या 'विशिष्ट दर्शन' पास जनरेट नहीं किया जा सकेगा।

6 जुलाई को चंपत राय ने ट्रस्ट के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह पूर्व आईएफएस (IFS) अधिकारी कृष्ण मोहन को नया कार्यवाहक महासचिव बनाया गया है (कृष्ण मोहन ने ही इस मामले में FIR दर्ज कराई थी)।

ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने भी इस्तीफा दे दिया है और गोपाल राव को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है। हालांकि, इन तीनों में से किसी को भी FIR में आरोपी नहीं बनाया गया है।


दक्षिण भारत के बड़े मंदिरों में क्या है SOP? अयोध्या को क्या सीखना चाहिए?
जब बात करोड़ों के चढ़ावे और पारदर्शी प्रबंधन की आती है, तो दक्षिण भारत के मंदिर पूरे देश के लिए एक 'रोल मॉडल' हैं। तिरुपति बालाजी (आंध्र प्रदेश), पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल) और मीनाक्षी अम्मन मंदिर (तमिलनाडु) जैसे सुप्रसिद्ध मंदिरों में दान की गिनती के लिए बेहद सख्त SOP फॉलो की जाती है।

तिरुपति बालाजी मंदिर में दान गिनने की प्रक्रिया को 'परकामनी' कहा जाता है। यह काम पूरी तरह से बुलेटप्रूफ शीशे वाले कमरों में होता है। श्रद्धालु बाहर से देख सकते हैं कि अंदर पैसे कैसे गिने जा रहे हैं।
गिनती करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए खास तरह की यूनिफॉर्म होती है, जिसमें कोई जेब नहीं होती। वे अंगूठी, कड़ा या कोई भी धातु पहनकर अंदर नहीं जा सकते।
अंदर जाने और बाहर आने से पहले त्रि-स्तरीय चेकिंग होती है। इसमें मेटल डिटेक्टर और बॉडी स्कैनर का इस्तेमाल अनिवार्य है।
खजाने और दान पेटियों की चाबियां किसी एक व्यक्ति के पास नहीं होतीं। दो अलग-अलग विभागों के अधिकारी जब अपने-अपने एक्सेस कार्ड या चाबियां लगाते हैं, तभी लॉकर या दान पेटी खुलती है।
कैमरों की निगरानी केवल रिकॉर्डिंग के लिए नहीं होती, बल्कि एक अलग कंट्रोल रूम से लगातार 'लाइव मॉनिटरिंग' की जाती है। मशीनरी और वजन कांटों का हर दिन ऑडिट होता है।

अयोध्या राम मंदिर में हुए इस खुलासे के बाद अब नई प्रबंधन समिति व्यवस्था को दुरुस्त करने में जुट गई है। उम्मीद है कि भविष्य में दक्षिण भारत के मंदिरों की तरह ही यहां भी ऐसी अचूक व्यवस्था लागू की जाएगी, जिससे भक्तों की आस्था और उनके द्वारा दिए गए दान का एक-एक पैसा सुरक्षित रहे।

 

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