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राष्ट्रीय

विश्व नेत्रदान दिवस: रोशनी बांटने का संकल्प, लाखों लोगों की जिंदगी बदल सकता है एक फैसला

Updated on Friday, July 10, 2026 14:28 PM IST

नेत्रदान ऐसा मानवीय कार्य है, जो किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के जीवन में दोबारा उजाला ला सकता है। हर साल 10 जुलाई को विश्व नेत्रदान दिवस (World Eye Donation Day) मनाया जाता है। विश्व नेत्रदान दिवस का उद्देश्य लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक करना और मृत्यु के बाद अपनी आंखें दान करने के लिए प्रेरित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद आज भी नेत्रदान को लेकर समाज में कई भ्रांतियां और जानकारी का अभाव है। ऐसे में विश्व नेत्रदान दिवस लोगों को इस विषय में जागरूक करने और अधिक से अधिक लोगों को इस अभियान से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर बन गया है।

नेत्रदान क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

नेत्रदान का अर्थ है किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आंखों के कॉर्निया (नेत्रगोलक की पारदर्शी बाहरी परत) को जरूरतमंद मरीज के प्रत्यारोपण के लिए दान करना। कॉर्निया क्षतिग्रस्त होने के कारण कई लोग दृष्टि खो देते हैं। ऐसे मरीजों की रोशनी कॉर्निया प्रत्यारोपण के जरिए वापस लाई जा सकती है। एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो लोगों को दृष्टि मिल सकती है, जिससे उनका जीवन, शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता का रास्ता फिर से खुल सकता है।

मृत्यु के बाद भी किसी के जीवन में भर सकता है उजाला

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार नेत्रदान केवल मृत्यु के बाद ही किया जाता है। किसी भी आयु का व्यक्ति, यदि उसकी आंखों का कॉर्निया उपयोग योग्य हो, नेत्रदान कर सकता है। मृत्यु के कुछ घंटों के भीतर प्रशिक्षित मेडिकल टीम कॉर्निया सुरक्षित तरीके से निकालती है। इस प्रक्रिया में मृतक के चेहरे की बनावट पर कोई असर नहीं पड़ता और अंतिम संस्कार में भी कोई बाधा नहीं आती। यही वजह है कि नेत्रदान को सबसे सरल और प्रभावी अंगदानों में से एक माना जाता है।

भारत में नेत्रदान की जरूरत और चुनौतियां

भारत में लाखों लोग कॉर्निया से जुड़ी बीमारियों के कारण दृष्टिबाधित हैं। हर साल बड़ी संख्या में मरीजों को कॉर्निया प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, लेकिन उपलब्ध दान किए गए कॉर्निया की संख्या मांग के मुकाबले काफी कम है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समाज में नेत्रदान को लेकर जागरूकता और परिवारों की सहमति बढ़े, तो हजारों लोगों को नई रोशनी मिल सकती है। देशभर में कई सरकारी और निजी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज तथा आई बैंक नेत्रदान को बढ़ावा देने के लिए लगातार अभियान चलाते हैं। स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

भ्रांतियां आज भी बनी हुई हैं बड़ी बाधा

नेत्रदान को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएं प्रचलित हैं। कुछ लोगों को लगता है कि नेत्रदान से शरीर विकृत हो जाएगा या धार्मिक मान्यताएं इसकी अनुमति नहीं देतीं। वहीं, कुछ लोग उम्र या चश्मा पहनने को भी नेत्रदान में बाधा मानते हैं। विशेषज्ञ इन धारणाओं को गलत बताते हैं। उनका कहना है कि अधिकांश धर्म मानव सेवा और दान को सर्वोच्च मानते हैं। इसके अलावा चश्मा पहनने वाले या अधिक उम्र के लोग भी कई मामलों में नेत्रदान कर सकते हैं। अंतिम निर्णय मेडिकल विशेषज्ञ जांच के बाद लेते हैं।

नेत्रदान की प्रक्रिया है सरल

नेत्रदान के इच्छुक व्यक्ति अपने जीवनकाल में किसी मान्यता प्राप्त आई बैंक या अस्पताल में संकल्प पत्र भर सकते हैं। हालांकि, मृत्यु के बाद अंतिम निर्णय परिवार की सहमति से ही होता है। इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि कोई व्यक्ति नेत्रदान करना चाहता है, तो उसे अपने परिवार को इस इच्छा के बारे में पहले से अवश्य बताना चाहिए। मृत्यु होने पर परिवार को तुरंत नजदीकी आई बैंक या अस्पताल को सूचना देनी चाहिए, ताकि निर्धारित समय के भीतर कॉर्निया सुरक्षित किया जा सके।

जागरूकता से बढ़ सकती है सफलता

विशेषज्ञों का मानना है कि नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने में मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं की बड़ी भूमिका है। समय-समय पर आयोजित जागरूकता अभियान, रैलियां, संगोष्ठियां और स्वास्थ्य शिविर लोगों की सोच बदलने में मदद करते हैं। सोशल मीडिया भी इस संदेश को व्यापक स्तर तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन चुका है।

अंगदान की संस्कृति को मिलेगा बढ़ावा

नेत्रदान केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और मानवता का प्रतीक भी है। यह लोगों को अंगदान के महत्व को समझने और समाज में सेवा की भावना को मजबूत करने का अवसर देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अधिक लोग नेत्रदान का संकल्प लें, तो देश में कॉर्निया प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे हजारों मरीजों को समय पर उपचार मिल सकता है।

हर व्यक्ति निभा सकता है अहम भूमिका

विश्व नेत्रदान दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश देने का अवसर है कि मृत्यु के बाद भी किसी के जीवन में रोशनी लाई जा सकती है। परिवारों के बीच इस विषय पर खुलकर चर्चा करना, नेत्रदान का संकल्प लेना और दूसरों को इसके लिए प्रेरित करना इस अभियान को मजबूत बना सकता है। एक छोटा-सा निर्णय किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के लिए नई उम्मीद, नया आत्मविश्वास और नई जिंदगी की शुरुआत बन सकता है।

 

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