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राष्ट्रीय

Air India प्लेन क्रैश में कैसे बची इकलौते यात्री की जान? नई रिपोर्ट में कई खुलासे

Updated on Sunday, June 14, 2026 11:24 AM IST

मौत को मात देकर दुनिया के सबसे दुर्लभ सरवाइवर बनने वाले विश्वास कुमार रमेश के लिए यह जिंदगी एक बहुत बड़ी और दर्दनाक कीमत पर मिली है। Air India प्लेन क्रैश में कैसे बची इकलौते यात्री की जान? नई रिपोर्ट में कई खुलासे Air India Plane Crash Report: 12 जून, 2025 को दोपहर के 1 बजकर 38 मिनट पर एअर इंडिया की फ्लाइट 171 ने अहमदाबाद हवाई अड्डे से लंदन गैटविक के लिए उड़ान भरी। मौसम बिल्कुल साफ था और विजिबिलिटी भी बेहतरीन थी। लेकिन उड़ान भरने के महज 32 सेकंड बाद ही आसमान में मौत मंडराने लगी। 242 यात्रियों और क्रू मेंबर्स से भरा यह विशाल विमान अचानक अनियंत्रित होकर जमीन की तरफ गिरने लगा और एयरपोर्ट से महज 1.7 किलोमीटर दूर क्रैश हो गया।


इस रोंगटे खड़े कर देने वाले भीषण हादसे में विमान में सवार 241 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, लेकिन एक शख्स चमत्कारिक रूप से जिंदा बच गया। लगभग एक साल तक यह दुनिया भर के विमानन विशेषज्ञों के लिए एक रहस्य बना रहा कि सीट नंबर 11A पर यात्रा कर रहे भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक विश्वास कुमार रमेश आखिर इस काल का ग्रास बनने से कैसे बच गए? गुजरात पुलिस के एक रिपोर्ट ने जिंदगी और मौत के बीच की उस कड़ी के रहस्यों से पर्दा उठा दिया है।


इमरजेंसी एग्जिट के पास टूटी बख्तरबंद जैसी बॉडी
जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, विश्वास कुमार रमेश विमान के उस हिस्से के पास बैठे थे, जहां इमरजेंसी एग्जिट था। टेकऑफ के तुरंत बाद विमान ने अपनी ऊंचाई खो दी और उसका पिछला हिस्सा पास के बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल-मेस कॉम्प्लेक्स से जा टकराया। टक्कर इतनी जोरदार थी कि विमान के परखच्चे उड़ गए और वह बीच से दो हिस्सों में टूट गया।

जब विमान हवा में ही टूट रहा था तब झटका इतना भीषण था कि विश्वास कुमार रमेश अपनी सीट (11A) समेत विमान से बाहर हवा में उछल गए। वे अभी भी अपनी सीट की बेल्ट से कसकर बंधे हुए थे।

मलबे से 50 फीट दूर गिरे, मिट्टी की दीवार बनी कवच
हादसे के दृश्यों को रीकंस्ट्रक्ट करने वाले अधिकारियों ने बताया कि विमान टूटने के बाद रमेश अपनी सीट सहित मुख्य मलबे से करीब 50 फीट दूर जाकर गिरे। वे जिस जगह गिरे वहां निर्माण और सौंदर्यीकरण के काम की वजह से कीचड़ और मिट्टी का एक बड़ा ढेर लगा हुआ था।


रमेश के कीचड़ वाले हिस्से में गिरने के कुछ ही सेकंड बाद विमान का अगला हिस्सा हॉस्टल परिसर से टकराया और उसमें एक जोरदार धमाका हुआ। इसने पूरे इलाके को एक धधकते हुए आग के गोले में तब्दील कर दिया। लेकिन तब तक रमेश उस 10 फीट ऊंचे मिट्टी के बांध के पीछे सुरक्षित गिर चुके थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में जांच दल के सूत्रों के हवाले से कहा, "निर्माण कार्य के लिए वहां बनाया गया मिट्टी का वह टीला विश्वास कुमार और विमान के मलबे के बीच एक सुरक्षा कवच बन गया। उसने विस्फोट से निकलने वाली भीषण गर्मी, आग की लपटों और ब्लास्ट के झटके को अपने ऊपर सोख लिया। इसी वजह से वे जलने से बच गए।"

कच्ची मिट्टी ने सोखा झटका
इस भीषण धमाके और आग की लपटों से सुरक्षित रहने के बाद उन्हें केवल कंधे और चेहरे पर मामूली चोटें आईं। उन्हें तुरंत अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जांचकर्ताओं ने इस पूरी घटनाक्रम को सुलझाने के लिए घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, मलबे के साक्ष्य और विमान के दूसरी तरफ से रिकॉर्ड किए गए एक अन्य वीडियो की मदद ली है।


जिंदगी तो मिली, पर सब कुछ उजड़ गया
मौत को मात देकर दुनिया के सबसे दुर्लभ सरवाइवर बनने वाले विश्वास कुमार रमेश के लिए यह जिंदगी एक बहुत बड़ी और दर्दनाक कीमत पर मिली है। इस हादसे में उनके साथ यात्रा कर रहे उनके छोटे भाई अजय की मौत हो गई थी। पिछले साल सितंबर में रमेश वापस ब्रिटेन अपने परिवार, पत्नी और छोटे बेटे के पास लौट चुके हैं, लेकिन एक साल बाद आज भी वे उस भयानक हादसे के शारीरिक जख्मों, मानसिक सदमे और गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।

 

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