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राष्ट्रीय

जगुआर फाइटर जेट्स के स्पेयर पार्ट्स की कमी होगी खत्म, स्वदेशी समाधान तलाशने में जुटी वायुसेना

Updated on Friday, May 22, 2026 21:07 PM IST

नई दिल्ली : डीप पेनिट्रेशन स्ट्राइक के लिए मशहूर फाइटर जेट जगुआर आज उसी तरह की समस्या का सामना कर रहा है, जैसी कभी मिग-21 जेट्स के सामने थी, यानी स्पेयर पार्ट्स की कमी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया में भारत ही अब एकमात्र देश है, जो अभी भी जगुआर फाइटर जेट का संचालन कर रहा है। जगुआर के पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों ने भी अब स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने में असमर्थता जता दी है।

भारतीय वायुसेना ने इसकी जानकारी अपने कैपेबिलिटी रोडमैप दस्तावेज में दी है। दस्तावेज के अनुसार, जगुआर विमानों में लगी मार्टिन-बेकर इजेक्शन सीटों में अप्रचलन की समस्या सामने आ रही है। इसकी मुख्य वजह मूल उपकरण निर्माता की ओर से स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता न होना बताया गया है। मार्टिन-बेकर ने आवश्यक स्पेयर पार्ट्स की 250 से अधिक लाइनों की सप्लाई करने में असमर्थता जताई है।

वायुसेना इस समस्या से निपटने के लिए मौजूदा इजेक्शन सीटों की मरम्मत इन-हाउस कर रही है। हालांकि, एयरफोर्स का मानना है कि इजेक्शन सीटों को और अधिक अप्रचलित होने से बचाने के लिए स्थायी समाधान बेहद जरूरी है। सीटों के सटीक आकार, फिटिंग, कार्यक्षमता और सामग्री संबंधी मानकों को पूरा करना भी आवश्यक है। अब एयरफोर्स देश में ही इसका समाधान विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, किसी भी एयरक्राफ्ट को उड़ान भरने से पहले कई तरह की जांच प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। मसलन, हर पार्ट सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं, कौन-सा एम्यूनिशन लगाया गया है और सभी सिस्टम ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं। इसके अलावा फ्यूल की मात्रा समेत कई जरूरी जांचें की जाती हैं। इन सभी जानकारियों को एक फॉर्म में दर्ज किया जाता है, जिसे फॉर्म-700 कहा जाता है। सभी जांच अधिकारी उस पर हस्ताक्षर करते हैं। सभी जांच पूरी होने के बाद यह फॉर्म पायलट को सौंपा जाता है, लेकिन यदि फॉर्म-700 में किसी तरह की खराबी दर्ज हो, तो उस एयरक्राफ्ट को उड़ान की अनुमति नहीं दी जाती।

इजेक्शन सीट एयरक्राफ्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यदि बर्ड हिट, इंजन फेलियर या किसी अन्य तकनीकी खराबी के चलते पायलट को उड़ान के दौरान विमान छोड़ना पड़े, तो यही सीट उसे सुरक्षित तरीके से एयरक्राफ्ट से बाहर निकालती है। अब जब मूल उपकरण निर्माता की ओर से स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध नहीं हो रहे हैं, तो इजेक्शन सीट में इस्तेमाल होने वाले कई अहम पार्ट्स की निर्धारित लाइफ खत्म होने के बाद एयरक्राफ्ट का उड़ान भरना संभव नहीं होगा। यही वजह है कि पार्ट्स की लाइफ पूरी तरह समाप्त होने से पहले ही एयरफोर्स स्वदेशी समाधान तलाशने में जुट गई है। फिलहाल भारतीय वायुसेना के पास जगुआर के 6 स्क्वाड्रन मौजूद हैं, जिन्हें हाल ही में अपग्रेड किया गया है।

अगर भारतीय वायुसेना के मौजूदा फ्लीट की स्थिति पर नजर डालें, तो मिग-21 के अलग-अलग वेरिएंट 'मिग-21 बिस, मिग-21 टाइप-96, मिग-27 और मिग-21 बाइसन' पहले ही फेज आउट हो चुके हैं। मिग-29 भी 2030 से चरणबद्ध तरीके से सेवा से बाहर होना शुरू हो जाएंगे। इसके बाद मिराज-2000 के 3 स्क्वाड्रन और जगुआर के 6 स्क्वाड्रन भी फेज आउट की प्रक्रिया में शामिल हो जाएंगे। यानी 2035 तक वायुसेना की पुरानी फाइटर फ्लीट लगभग पूरी तरह बाहर हो जाएगी।

इस कमी को पूरा करने के लिए एयरफोर्स स्वदेशी फाइटर जेट तेजस मार्क-1ए और 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट की खरीद पर भरोसा कर रही है। एचएएल के साथ कुल 220 तेजस फाइटर जेट की खरीद का कॉन्ट्रैक्ट किया जा चुका है। अब तक तेजस मार्क-1 के 38 जेट वायुसेना में शामिल किए जा चुके हैं, जबकि 180 तेजस मार्क-1ए की डिलीवरी अभी तक शुरू नहीं हो सकी है।

 

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