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मिथिला के चौरचन से गणेशोत्सव तक, भाद्रपद में दिखेगा भारतीय परंपराओं का विविध रंग

Updated on Monday, September 14, 2026 15:21 PM IST

भाद्रपद (भादों) का महीना भारतीय लोकजीवन में धार्मिक आस्था, व्रत-उपवास और उत्सवों की विविध परंपराओं को अपने में समेटे हुए है। इसी क्रम में चौरचन, गणेश चतुर्थी और हरतालिका तीज ऐसे पर्व हैं, जिनमें भक्ति के साथ लोक संस्कृति, पारिवारिक भावनाओं और सामाजिक परंपराओं की गहरी झलक दिखाई देती है। महाराष्ट्र से लेकर मिथिलांचल और उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों तक गणेश चतुर्थी की धूम रहती है, वहीं मिथिला में चौरचन यानी चौठचंद्र पर्व चंद्रमा की पूजा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के कारण अपनी अलग पहचान रखता है। हरतालिका तीज भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से जुड़ा पर्व है, जिसमें महिलाएं दांपत्य सुख, पति की दीर्घायु और मनोवांछित वर की कामना के साथ व्रत रखती हैं।

मिथिला की पहचान से जुड़ा है चौरचन पर्व
मिथिलांचल में चौरचन को चौठचंद्र, चौरचन या चौथ चंद्र के नाम से जाना जाता है। यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है और इसका मुख्य केंद्र चंद्रमा की पूजा है। मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा में इस पर्व का विशेष स्थान है। चौरचन के दिन व्रत रखने वाली महिलाएं घर-आंगन की साफ-सफाई के बाद पारंपरिक तरीके से अरिपन बनाती हैं। इसके बाद चंद्रमा के उदय होने पर विधि-विधान से पूजा की जाती है और फल, मिठाई, खीर, पूरी तथा अन्य पारंपरिक पकवान अर्पित कर चंद्रदेव को अर्घ्य दिया जाता है। चौरचन में चंद्रमा के साथ भगवान गणेश की आराधना का भी विधान है।

चंद्रमा की पूजा और मिथ्या कलंक से जुड़ी मान्यता
चौरचन पर्व से जुड़ी धार्मिक मान्यता चंद्रमा और भगवान गणेश की कथा से जुड़ी है। लोक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश के स्वरूप को देखकर चंद्रमा के हंसने से गणेश नाराज हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया। बाद में चंद्रमा की प्रार्थना से प्रसन्न होकर गणेश ने श्राप के प्रभाव को कम किया। इसी मान्यता के कारण चतुर्थी के दिन चंद्रमा की विशेष पूजा की जाती है और चंद्रदर्शन के साथ अर्घ्य देने की परंपरा है। मिथिला में यह पर्व इस विश्वास के साथ मनाया जाता है कि चंद्रमा की पूजा करने और निर्धारित विधि से अर्घ्य देने से मिथ्या कलंक से बचाव होता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

अरिपन और पारंपरिक पकवान हैं चौरचन की खास पहचान
चौरचन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि यह मिथिला की लोक कला और खान-पान की परंपरा को भी सामने लाता है। व्रत के दिन घर के आंगन में चावल के घोल से अरिपन बनाया जाता है। पूजा स्थल पर केले के पत्तों पर विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान, फल और प्रसाद सजाए जाते हैं। खीर, पूरी, मिठाई, पिड़ुकिया, मालपुआ और अन्य घरेलू व्यंजन इस पर्व की विशेषता माने जाते हैं। शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद महिलाएं पूजा-अर्चना कर अर्घ्य देती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मिथिला की पारंपरिक कला, लोकगीत, घरेलू व्यंजन और सामूहिक सहभागिता एक साथ दिखाई देती है।

गणेश चतुर्थी में घर-घर विराजते हैं गणपति
देश के दूसरे हिस्सों में इसी तिथि के आसपास गणेश चतुर्थी का पर्व व्यापक स्तर पर मनाया जाता है। भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है। महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का उत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहां घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। पूजा-अर्चना, आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक आयोजनों के बीच यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकजुटता का भी माध्यम बनता है। कई स्थानों पर गणेशोत्सव कई दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी के दिन प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है।

एक ही समय में अलग-अलग रंगों में दिखती है भारतीय संस्कृति
चौरचन और गणेश चतुर्थी का संबंध भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से है, लेकिन दोनों पर्वों की स्थानीय परंपराएं अलग-अलग सांस्कृतिक रंग प्रस्तुत करती हैं। महाराष्ट्र और देश के कई हिस्सों में जहां गणपति स्थापना, सार्वजनिक पंडाल और सामूहिक उत्सव प्रमुख होते हैं, वहीं मिथिला में चंद्रमा की पूजा, अरिपन, व्रत और पारंपरिक प्रसाद चौरचन की पहचान बनते हैं। यही विविधता भारतीय त्योहारों को विशिष्ट बनाती है। एक ही तिथि और धार्मिक परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय संस्कृति के अनुरूप अलग स्वरूप लेती है और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवित रखती है।

हरतालिका तीज में शिव-पार्वती की आराधना
हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है और भगवान शिव तथा माता पार्वती की आराधना से जुड़ा पर्व है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी कथा को आधार बनाकर महिलाएं हरतालिका तीज का व्रत करती हैं। विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं।

निर्जला व्रत और कठिन साधना की परंपरा
हरतालिका तीज को कठिन व्रतों में गिना जाता है। कई परंपराओं में महिलाएं पूरे दिन और रात निर्जला व्रत रखती हैं। पूजा के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं या मिट्टी से बनाए गए स्वरूप स्थापित किए जाते हैं। शाम के समय पूजा और कथा का विशेष महत्व होता है। व्रत रखने वाली महिलाएं पारंपरिक परिधान और श्रृंगार के साथ पूजा में शामिल होती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में तीज के गीत गाती हैं और लोक परंपराओं से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेती हैं। इस तरह धार्मिक अनुष्ठान के साथ यह पर्व महिलाओं के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूत करता है।

लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पर्व
हरतालिका तीज की खास विशेषताओं में इसके लोकगीत और पारंपरिक आयोजन शामिल हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर तीज की शुभकामनाएं देती हैं और सामूहिक रूप से पूजा करती हैं। पारंपरिक गीतों में शिव-पार्वती के विवाह, माता पार्वती की तपस्या और दांपत्य जीवन से जुड़े भावों की अभिव्यक्ति होती है। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में आज भी तीज के अवसर पर लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों की विशेष भूमिका है। हालांकि समय के साथ पर्व मनाने के तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इसकी मूल धार्मिक भावना और पारिवारिक जुड़ाव आज भी कायम है।

तीनों पर्वों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका
चौरचन और हरतालिका तीज में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। चौरचन में महिलाएं व्रत रखकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं। वहीं हरतालिका तीज में महिलाएं पति की दीर्घायु और दांपत्य जीवन की मंगलकामना के साथ व्रत करती हैं। दोनों पर्वों में घर की साफ-सफाई, पूजा स्थल की सजावट, पारंपरिक व्यंजन तैयार करना और लोकगीतों की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। इससे त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहते, बल्कि परिवार और समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी भी बनते हैं।

2026 में एक ही महीने में पर्वों की विशेष श्रृंखला
वर्ष 2026 में भी सितंबर का महीना इन प्रमुख पर्वों के कारण धार्मिक दृष्टि से विशेष है। हरतालिका तीज 14 सितंबर को मनाई जाएगी, जबकि मिथिला परंपरा के अनुसार चौरचन भी 14 सितंबर को पड़ रहा है। गणेश चतुर्थी भी इसी दिन मनाई जाएगी। इसके बाद गणेशोत्सव की परंपरा अनंत चतुर्दशी तक जारी रहेगी और 25 सितंबर को गणेश विसर्जन किया जाएगा। इस तरह कुछ ही दिनों के अंतराल में देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की श्रृंखला देखने को मिलेगी।

बदलते दौर में भी कायम है परंपरा
आधुनिक जीवनशैली और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद इन पर्वों की परंपराएं लगातार आगे बढ़ रही हैं। शहरों में रहने वाले परिवार भी अपनी क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार त्योहार मनाने का प्रयास करते हैं। डिजिटल माध्यमों ने भी पर्वों से जुड़ी जानकारी, लोकगीतों और पूजा-पद्धतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है। मिथिला के चौरचन से लेकर महाराष्ट्र के गणेशोत्सव और उत्तर भारत की हरतालिका तीज तक, इन पर्वों में स्थानीय संस्कृति और आधुनिकता का मेल दिखाई देता है।

आस्था के साथ सांस्कृतिक विरासत को बचाने का संदेश
चौरचन, गणेश चतुर्थी और हरतालिका तीज तीन अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के पर्व होते हुए भी भारतीय समाज की एक साझा विशेषता सामने लाते हैं—आस्था के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने की भावना। चौरचन मिथिला की लोक संस्कृति और चंद्र उपासना की परंपरा को सामने लाता है, गणेश चतुर्थी सामूहिक उत्सव और गणपति भक्ति का व्यापक स्वरूप दिखाती है, जबकि हरतालिका तीज शिव-पार्वती की आराधना के साथ दांपत्य और पारिवारिक मंगल की कामना से जुड़ी है। इन पर्वों के जरिए केवल धार्मिक मान्यताएं ही आगे नहीं बढ़तीं, बल्कि लोककला, खान-पान, गीत-संगीत और सामाजिक रिश्तों की परंपराएं भी नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं। यही विविधता भारत की सांस्कृतिक पहचान को और समृद्ध बनाती है।

 

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