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राष्ट्रीय

20 साल बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था का नया शक्ति केंद्र बन रहा BRICS

Updated on Wednesday, September 09, 2026 12:24 PM IST

गोल्डमैन सैक्स द्वारा दिए गए एक संक्षिप्त नाम से शुरू हुआ BRICS अब दो दशक बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे प्रमुख संस्थागत पहचानों में शुमार हो चुका है। 2026 में भारत की मेजबानी में होने वाले ब्रिक्स समिट से पहले यह समूह अपनी आर्थिक शक्ति, विस्तार और बदलते वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका को लेकर चर्चा में है।

आइडिया से राजनीतिक प्लेटफॉर्म तक
सीनियर जर्नलिस्ट और रिसर्चर आरएन भास्कर के अनुसार, ब्रिक्स मूल रूप से गोल्डमैन सैक्स की एक “बनावटी सोच” थी, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को शामिल किया गया था। लेकिन रूस ने इसे जल्दी ही एक ठोस प्लेटफॉर्म का रूप देने का विजन अपनाया। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने और हालिया विस्तार में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, यूएई तथा सऊदी अरब के जुड़ने से समूह का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। अब यह सिर्फ अनौपचारिक आर्थिक चर्चा का मंच नहीं, बल्कि व्यापार, वित्त, विकास, प्रौद्योगिकी, सप्लाई चेन और वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर सक्रिय प्लेटफॉर्म बन चुका है।

आर्थिक ताकत के आंकड़े: जीडीपी में बढ़त, व्यापार में अभी गुंजाइश
आईएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर वैश्विक जीडीपी में ब्रिक्स देशों का हिस्सा करीब 40 प्रतिशत रहा, जबकि जी-7 का हिस्सा लगभग 29 प्रतिशत था। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (अंकटाड) के अनुसार, ब्रिक्स सदस्यों के बीच आपसी व्यापार 2003 में 84 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में लगभग 1.17 ट्रिलियन डॉलर हो गया—यानी 13 गुना से अधिक वृद्धि। इसके बावजूद यह वैश्विक व्यापार का महज 5 प्रतिशत ही है। वैश्विक मर्चेंडाइज निर्यात में भी ब्रिक्स की हिस्सेदारी 2003 के करीब 12 प्रतिशत से दोगुनी होकर 2024 में 24 प्रतिशत पहुंच गई। निर्यात का मूल्य एक ट्रिलियन से बढ़कर लगभग छह ट्रिलियन डॉलर हो गया। हालांकि चीन अभी भी ब्रिक्स के आंतरिक व्यापार में सबसे बड़ा निर्यातक और आयातक बना हुआ है।

विशेषज्ञों की नजर: गहरी एकीकरण की कमी सबसे बड़ी चुनौती
पूर्व आईआईएफटी वाइस चांसलर प्रो. मनोज पंत कहते हैं, “चीन विश्व व्यापार के केंद्र में है।” उनके अनुसार, व्यापार में वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन इससे गहराई से जुड़ा आर्थिक ब्लॉक बनने का संकेत नहीं मिलता। छोटे उद्योगों के बीच संस्थागत, दूरसंचार और व्यावसायिक कड़ियों की कमी एक एकीकृत ब्रिक्स बाजार के विकास को सीमित कर रही है। पंत निवेश को ज्यादा सार्थक पैमाना मानते हैं, क्योंकि केवल व्यापार से अर्थव्यवस्थाएं संरचनात्मक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर नहीं बनतीं। आरएन भास्कर भारत की शुरुआती भागीदारी को ग्लोबल साउथ के साथ उसके लंबे जुड़ाव और विकासशील देशों में नेतृत्व की इच्छा से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ब्रिक्स प्लेटफॉर्म काम कर रहा है और ज्यादा देश गैर-डॉलर मुद्राओं में लेनदेन के लिए तैयार हो रहे हैं।

न्यू डेवलपमेंट बैंक और वैकल्पिक वित्त की दिशा
ब्रिक्स का सबसे ठोस संस्थागत योगदान 2014 में स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) रहा है। यह पारंपरिक ब्रेटन वुड्स ढांचे के बाहर विकास वित्तपोषण का विकल्प पेश करता है। रियो में 2025 के समिट में स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण और फंडिंग स्रोतों के विविधीकरण का समर्थन किया गया। समूह मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को खत्म करने की बजाय उसके अंदर उभरते बाजारों के लिए ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग कर रहा है।

भारत की 2026 अध्यक्षता: व्यावहारिक सहयोग पर जोर
भारत की चेयरशिप में दृष्टिकोण मौजूदा व्यवस्था से टकराव की बजाय व्यावहारिक आर्थिक सहयोग पर केंद्रित रहा है। जयपुर में 16वीं ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में डब्ल्यूटीओ-केंद्रित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली, मजबूत वैल्यू चेन, एमएसएमई अंतरराष्ट्रीयकरण, व्यापार वित्त और डिजिटल सेवाओं पर जोर दिया गया। “ब्रिक्स आर्थिक साझेदारी 2030 रणनीति” को आगे बढ़ाया गया जिसमें व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, नवाचार और सतत विकास शामिल हैं।

आगे की चुनौती: आकार से रिश्ते बनाना
ब्रिक्स ने पहले ही साबित कर दिया है कि उसकी अर्थव्यवस्थाएं बड़ी हैं। अगले दशक की असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह अपने आकार के अनुरूप गहरे आर्थिक संबंध बना पाता है। समूह ने मल्टीपोलर वैश्विक अर्थव्यवस्था के उदय में योगदान दिया है, दृश्यता और सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाई है। अब जरूरत उन संस्थागत कड़ियों को मजबूत करने की है, जो व्यापार को वास्तविक आर्थिक एकीकरण में बदल सकें।

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