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राष्ट्रीय

भारत का पवन ऊर्जा क्षेत्र 100 गीगावाट की राह पर, विनिर्माण और रिपावरिंग पर जोर

Updated on Friday, September 04, 2026 12:36 PM IST

भारत का पवन ऊर्जा क्षेत्र अब केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि तेजी से एक बड़े औद्योगिक और निर्यात क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने रिकॉर्ड 6.05 गीगावाट नई पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी है और 31 जुलाई 2026 तक कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 58.14 गीगावाट हो गई है। उद्योग अब 2030 तक 100 गीगावाट क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हर साल करीब 10 गीगावाट नई क्षमता जोड़ने की जरूरत होगी। पवन ऊर्जा क्षेत्र के विनिर्माण, अपतटीय पवन ऊर्जा, रिपावरिंग और निर्यात को लेकर रणनीति पर 7 से 9 अक्टूबर तक चेन्नई ट्रेड सेंटर में आयोजित होने वाले विंडर्जी इंडिया 2026 में चर्चा होगी।

2030 तक 100 गीगावाट का लक्ष्य
इंडियन विंड टरबाइन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IWTMA) के शोध के अनुसार, भारत में फिलहाल करीब 43 गीगावाट की पवन ऊर्जा परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। वहीं, 150 मीटर हब ऊंचाई पर देश की आकलित पवन ऊर्जा क्षमता 1,164 गीगावाट तक है। उद्योग का लक्ष्य 2030 तक 100 गीगावाट और 2035 तक 155 गीगावाट स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता हासिल करना है। IWTMA के सचिव और सुजलॉन एनर्जी के अध्यक्ष-कॉरपोरेट अफेयर्स एवं रिटेल बिजनेस दिनेश जगदाले ने कहा कि भारत का पवन ऊर्जा क्षेत्र उभरते उद्योग से आगे बढ़कर 58 गीगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता वाले क्षेत्र में बदल चुका है। उन्होंने कहा कि देश का विनिर्माण आधार अब वैश्विक बाजारों में टरबाइन का निर्यात कर रहा है और 100 गीगावाट के लक्ष्य को हासिल करने के लिए निर्माताओं, डेवलपर्स, नीति-निर्माताओं और नवाचारकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

घरेलू विनिर्माण क्षमता में बड़ा विस्तार
पवन ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार में घरेलू विनिर्माण क्षमता की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश में टरबाइन निर्माण क्षमता 2014 में करीब 10 गीगावाट सालाना थी, जो अब बढ़कर 24 गीगावाट सालाना हो गई है। इसमें 70-80% तक घरेलू मूल्यवर्धन शामिल है। वित्त वर्ष 2025-26 में पवन ऊर्जा उपकरणों का निर्यात 12,000 करोड़ रुपए से अधिक रहा, जो पिछले स्तर की तुलना में करीब 50% की वृद्धि है। एनविज़न एनर्जी इंडिया के ग्लोबल बिजनेस डेवलपमेंट प्रमुख सुमन नाग ने कहा कि पवन ऊर्जा क्षेत्र में निर्यात आधारित कंपनियों का विस्तार भारत को वैश्विक पवन निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद कर रहा है।

अपतटीय पवन ऊर्जा की ओर बढ़ता कदम
भारत अब अपतटीय पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहा है। देश में 1 गीगावाट की पायलट अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना के साथ इस क्षेत्र में नए अवसरों पर काम हो रहा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने IWTMA के सहयोग से पवन ऊर्जा से संबंधित पहला अपतटीय पोर्टल ‘WT-MARUT’ भी लॉन्च किया है। इस पहल का उद्देश्य अपतटीय पवन ऊर्जा क्षेत्र में परियोजनाओं के क्रियान्वयन को गति देने के साथ भारत को वैश्विक पवन ऊर्जा विनिर्माण केंद्र के रूप में मजबूत करना है।

ऊर्जा बदलाव के साथ औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र
दिल्ली में आयोजित विंडर्जी इंडिया 2026 के कर्टेन रेजर कार्यक्रम में MNRE के संयुक्त सचिव राजेश कुलहरि ने कहा कि भारत का ऊर्जा संक्रमण केवल नई मेगावाट क्षमता जोड़ने तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक ऐसा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना जरूरी है, जो रोजगार पैदा करे, विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा दे, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करे तथा आयातित और अस्थिर जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करे। उन्होंने कहा कि पवन ऊर्जा क्षेत्र का विस्तार भारत के व्यापक ऊर्जा बदलाव के साथ औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन का भी माध्यम बन सकता है।

टैरिफ से आगे परियोजनाओं की व्यवहार्यता
पवन ऊर्जा परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता को लेकर उद्योग अब केवल सबसे कम टैरिफ वाली बोली तक सीमित दृष्टिकोण से आगे बढ़ने की जरूरत पर जोर दे रहा है। समय पर बिजली खरीद समझौते (PPA), ट्रांसमिशन नेटवर्क की तैयारी और ऐसी बोली संरचनाओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो पवन, हाइब्रिड और फर्म नवीकरणीय ऊर्जा के अतिरिक्त प्रणालीगत मूल्य को पहचानें। भारत अब स्टैंडअलोन पवन और सौर परियोजनाओं से आगे बढ़कर पवन-सौर हाइब्रिड, स्टोरेज आधारित तथा फर्म और डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी (FDRE) की खरीद की दिशा में बढ़ रहा है।

लॉजिस्टिक्स बनी अहम कड़ी
पवन ऊर्जा उपकरणों के विनिर्माण, परियोजना निर्माण और निर्यात के लिए मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और प्रभावी लॉजिस्टिक्स को अहम माना जा रहा है। बड़े और भारी पवन टरबाइन घटकों की ढुलाई में रूट प्लानिंग, परमिट, हैवी-लिफ्ट परिवहन, वेयरहाउसिंग और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। उद्योग के अनुसार, WTG घटकों की समयबद्ध और भरोसेमंद आवाजाही परियोजनाओं के समय पर क्रियान्वयन के साथ-साथ उनके रखरखाव के लिए भी जरूरी है। डिजिटलीकरण और ट्रैकिंग प्रणालियों से लॉजिस्टिक्स की दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिल रही है।

रिपावरिंग से बढ़ सकती है क्षमता
देश में पुराने पवन टरबाइनों को आधुनिक तकनीक से बदलकर या अपग्रेड कर रिपावरिंग के जरिए उत्पादन बढ़ाने की बड़ी संभावना है। उच्च पवन क्षमता वाले क्षेत्रों में 19,000 से अधिक पुराने सब-मेगावाट पवन टरबाइन मौजूद हैं। उद्योग के अनुसार, आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से इन परियोजनाओं का प्रदर्शन काफी बढ़ाया जा सकता है। पुराने टरबाइनों की क्षमता उपयोग दर (CUF) करीब 14-15% से बढ़ाकर लगभग 30% तक पहुंचाने की संभावना जताई जा रही है। इससे मौजूदा भूमि और ग्रिड बुनियादी ढांचे का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकेगा और नई जमीन की जरूरत को भी सीमित करने में मदद मिल सकती है।

विंडर्जी इंडिया 2026 में वैश्विक भागीदारी
IWTMA और पीडीए वेंचर्स प्रा. लि. की ओर से आयोजित विंडर्जी इंडिया 2026 को विद्युत मंत्रालय और MNRE का समर्थन प्राप्त है। आयोजकों के अनुसार, इसमें 20,000 से अधिक लोग, 400 से ज्यादा प्रतिनिधि और 30 से अधिक देशों के 350 प्रदर्शक हिस्सा लेंगे। सुजलॉन इंडिया आयोजन का प्लेटिनम पार्टनर है। एनविज़न और सेनवियॉन गोल्ड पार्टनर, जबकि मेनज़ियोन और रक्षा सिल्वर पार्टनर हैं। जर्मनी, डेनमार्क और स्पेन के देश-पवेलियन भी आयोजन में शामिल होंगे।

दो दिवसीय सम्मेलन और एकेडेमिया सत्र
आयोजन के दौरान ‘विंड- पावरिंग इंडियाज एनर्जी रेजिलिएंस’ विषय पर दो दिवसीय सम्मेलन होगा। इसके अलावा पवन ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती कुशल मानव संसाधन की जरूरतों पर चर्चा के लिए विशेष एकेडेमिया सत्र भी आयोजित किया जाएगा। विंडर्जी इंडिया 2026 का आठवां संस्करण 7 से 9 अक्टूबर 2026 तक चेन्नई ट्रेड सेंटर में आयोजित होगा। आयोजन में पवन ऊर्जा क्षेत्र के विनिर्माण, परियोजना विकास, नीति, लॉजिस्टिक्स, अपतटीय ऊर्जा, रिपावरिंग और निर्यात से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। सम्मेलन को भारत के पवन ऊर्जा क्षेत्र की भविष्य की दिशा तय करने के लिए उद्योग, सरकार और अन्य हितधारकों के प्रमुख मंच के रूप में देखा जा रहा है।

 

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