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राष्ट्रीय

इसरो की एक और बड़ी कामयाबी, ईओएस-05 को तय कक्षा में पहुंचाने पर पीएम मोदी ने बताया गर्व का पल

Updated on Friday, September 04, 2026 12:32 PM IST

भारत के अंतरिक्ष अभियान ने शुक्रवार को एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के जीएसएलवी-एफ17 ने उन्नत अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 को सफलतापूर्वक उसकी निर्धारित जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित कर दिया। इस सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश के लिए गर्व का पल बताते हुए इसरो और भारतीय उद्योग के बीच बढ़ती साझेदारी को भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र की नई ताकत करार दिया।

पीएम मोदी ने बताया गर्व का पल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर इसरो की सफलता की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत के पहले इमेजिंग सैटेलाइट ईओएस-05 को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में ले जाने वाले जीएसएलवी-एफ17 का सफल प्रक्षेपण भारत के स्पेस सेक्टर की उत्कृष्टता, इनोवेशन और बढ़ती क्षमताओं को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इसरो और भारतीय उद्योग के बीच बढ़ती साझेदारी देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ताकत और विस्तार दे रही है। साथ ही, इससे पूरे स्पेस इकोसिस्टम में भारत की क्षमताओं को बढ़ावा मिल रहा है।

इसरो ने मिशन को बताया सफल
इसरो ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर मिशन की सफलता की जानकारी साझा की। इसरो ने कहा कि मिशन सफल रहा और जीएसएलवी-एफ17 ने ईओएस-05 को तय कक्षा में स्थापित करके अपना मिशन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। यह प्रक्षेपण भारत के बढ़ते अंतरिक्ष कार्यक्रम और भारी उपग्रहों को निर्धारित कक्षा में स्थापित करने की क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

श्रीहरिकोटा से 107वां लॉन्च
सफल प्रक्षेपण के बाद इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जीएसएलवी-एफ17 ने एडवांस्ड अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट ईओएस-05 यानी जियो इमेजिंग सैटेलाइट को सफलतापूर्वक और सटीक तरीके से निर्धारित कक्षा में स्थापित किया है। उन्होंने बताया कि यह श्रीहरिकोटा से 107वां लॉन्च और जीएसएलवी का 19वां मिशन है। उनके मुताबिक, इस मिशन की सफलता भारत के लॉन्च व्हीकल कार्यक्रम में हासिल की गई तकनीकी प्रगति को भी दर्शाती है।

जीएसएलवी की क्षमता में लगातार हुआ सुधार
डॉ. वी. नारायणन ने कहा कि जीएसएलवी का पहला प्रक्षेपण जीएसएलवी-डी1 था, जिसमें 1,536 किलोग्राम का पेलोड ले जाया गया था। इसके बाद से इसरो ने व्हीकल के स्ट्रक्चरल मास को ऑप्टिमाइज़ करने के साथ-साथ प्रोपल्शन सिस्टम में लगातार सुधार किया। उन्होंने कहा कि इन तकनीकी सुधारों के जरिए जीएसएलवी की परफॉर्मेंस को धीरे-धीरे बेहतर बनाया गया। अब इसी लॉन्च व्हीकल के जरिए 2,367 किलोग्राम वजन वाले सबसे भारी सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित किया गया है।

भारी उपग्रह को कक्षा में पहुंचाना अहम उपलब्धि
ईओएस-05 का सफल प्रक्षेपण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए जीएसएलवी की पेलोड क्षमता और मिशन क्षमता में हुई प्रगति सामने आई है। शुरुआती मिशनों की तुलना में अब यह लॉन्च व्हीकल अधिक भारी उपग्रहों को निर्धारित कक्षा तक पहुंचाने में सक्षम हुआ है। इस उपलब्धि को भारत के स्वदेशी अंतरिक्ष प्रक्षेपण कार्यक्रम की बढ़ती तकनीकी क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे भविष्य के जटिल और अधिक वजन वाले अंतरिक्ष मिशनों के लिए भी आधार मजबूत होता है।

अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ रही निजी क्षेत्र की भूमिका
इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बताया कि लॉन्च पैड का निर्माण भारत सरकार की ओर से किया जाएगा, लेकिन उसके संचालन के लिए अलग-अलग मॉडल अपनाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि एक विकल्प स्थायी कर्मचारियों के जरिए संचालन का है, जबकि दूसरा विकल्प निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों को संचालन की जिम्मेदारी सौंपने का है। इससे संकेत मिलता है कि भारत अपने अंतरिक्ष इकोसिस्टम में सरकारी संस्थानों के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को और बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इसरो और उद्योग की साझेदारी को मिल रहा विस्तार
प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने संदेश में इसरो और भारतीय उद्योग के बीच बढ़ती साझेदारी को रेखांकित किया। भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रह गया है और निजी कंपनियां भी इसके विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका बढ़ा रही हैं। उपग्रह निर्माण, लॉन्च सेवाओं, अंतरिक्ष आधारित अनुप्रयोगों और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी से देश के स्पेस इकोसिस्टम को व्यापक बनाने की कोशिश की जा रही है।

अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर
ईओएस-05 का सफल प्रक्षेपण भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक की क्षमताओं को भी रेखांकित करता है। जीएसएलवी जैसे प्रक्षेपण यान को लगातार उन्नत करना और भारी उपग्रहों को निर्धारित कक्षा में स्थापित करना देश की दीर्घकालिक अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं के लिए अहम है। इसरो की उपलब्धियों ने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में एक सक्षम और भरोसेमंद खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है। नए प्रक्षेपणों के साथ देश की कोशिश न केवल वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता बढ़ाने की है, बल्कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी को भी विस्तार देने की है।

भविष्य के मिशनों के लिए मजबूत आधार
जीएसएलवी-एफ17 की सफलता आने वाले मिशनों के लिए भी महत्वपूर्ण आधार तैयार करती है। भारी पेलोड को सटीक कक्षा में स्थापित करने की क्षमता में सुधार से भारत के लिए उन्नत अर्थ ऑब्जर्वेशन, संचार और अन्य उपग्रह मिशनों की संभावनाएं मजबूत होती हैं। प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि इसरो और भारतीय उद्योग की साझेदारी भारत के स्पेस प्रोग्राम को नई ताकत दे रही है, इस क्षेत्र में सरकार की व्यापक रणनीति को भी सामने रखता है। ऐसे में ईओएस-05 मिशन की सफलता वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ-साथ भारत के बढ़ते अंतरिक्ष इकोसिस्टम की तस्वीर भी पेश करती है।

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