ध्रुवीय अनुसंधान पोत की कीमत 400 करोड़ से बढ़कर करीब 2600 करोड़ रुपये कैसे पहुंची? पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने सफाई दी है। सरकार ने 2689 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। जानिए पोत की लागत बढ़ने की पूरी वजह और खरीद प्रक्रिया की कहानी।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि ध्रुवीय अनुसंधान पोत (पीआरवी) की खरीद के लिए वित्त मंत्रालय ने 2689 करोड़ रुपये मंजूर कर दिए हैं। अब इसकी खरीद के लिए आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
यह रिसर्च जहाज अंटार्कटिक महाद्वीप में शोध के लिए जाएगा। पहले इसकी कीमत 400 करोड़ रुपये थी लेकिन अब इसकी खरीद में देरी के चलते लागत बढ़कर 2600 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। ‘हिन्दुस्तान’ अखबार ने विदेश मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट के हवाले से इस बाबत खबर प्रकाशित की थी। इस पर मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि प्रशासनिक देरी की वजह से ऐसा नहीं हुआ बल्कि अनेक अपरिहार्य, अनजाने और वैध बाहरी कारणों के चलते यह स्थिति उत्पन्न हुई।
पहले 490 करोड़ मंजूर किए थे
मंत्रालय ने बताया कि वर्ष 2010 में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने पीआरवी के लिए 490 करोड़ मंजूर किए थे। इसके बाद मंत्रालय ने खरीद प्रक्रिया शुरू की। वर्ष 2013 में प्रारंभिक निविदा प्रक्रिया के दौरान न्यूनतम बोलीदाता की लागत स्वीकृत बजट की तुलना में अधिक थी। इसलिए लागत समिति ने 1051 करोड़ की संशोधित लागत की सिफारिश की, जिसे 2014 में सरकार ने अप्रूव किया। इस बारे में आशय पत्र जारी किए जाने के बाद पोत निर्माता ने टेंडर की शर्तों में कुछ संशोधन की मांग की जो सरकार को स्वीकार्य नहीं थे।
20 फीसदी अतिरिक्त राशि शामिल
भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय (आईएमयू) को वर्तमान बाजार परिस्थितियों के आधार पर पोत की लागत का आकलन करने का जिम्मा सौंपा गया। आईएमयू ने पोत की संशोधित आधार लागत 264 मिलियन अमेरिकी डॉलर निर्धारित करने की सिफारिश की जिसे स्वीकार किया। चिह्नित आवश्यकताओं के लिए 20 फीसदी अतिरिक्त राशि को शामिल किया गया।
क्यों जरूरी है भारत का अपना ध्रुवीय अनुसंधान पोत
भारत अभी तक अंटार्कटिका और अन्य ध्रुवीय अभियानों के लिए बड़े पैमाने पर किराए पर लिए गए आइस-क्लास जहाजों पर निर्भर रहा है। सरकार के अनुसार इन जहाजों का इस्तेमाल वैज्ञानिकों, उपकरणों और जरूरी सामान को ध्रुवीय क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। अपना पोत होने से इस निर्भरता को कम करने के साथ अभियानों की योजना और वैज्ञानिक गतिविधियों को अधिक लचीले तरीके से संचालित किया जा सकेगा।
प्रस्तावित पीआरवी केवल सामान ढोने वाला जहाज नहीं होगा। इसमें वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए प्रयोगशालाएं और ध्रुवीय परिस्थितियों में काम करने की क्षमता होगी। आइस-ब्रेकिंग क्षमता के कारण यह समुद्री बर्फ वाले इलाकों में भी आगे बढ़ सकेगा। प्रस्ताव में वैज्ञानिकों और सहयोगी कर्मचारियों के लिए विशेष आवास, हेलीडेक और भारी उपकरणों को संभालने के लिए क्रेन जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।
इस परियोजना का महत्व जलवायु परिवर्तन और मानसून से जुड़े शोध के लिहाज से भी है। संसदीय समिति ने कहा है कि ध्रुवीय क्षेत्रों में होने वाले बदलावों का वैश्विक जलवायु प्रणाली, समुद्री धाराओं, समुद्र के स्तर और मौसम के पैटर्न पर सीधा असर पड़ता है। समिति ने भारत के अपने आइस-क्लास पोत के अभाव को ध्रुवीय शोध के विस्तार में एक बड़ी बाधा बताया है।