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किसान संगठनों में अहंकार और नेतृत्व की लड़ाई से आंदोलन कमजोर: सुखजीत सिंह

Updated on Thursday, August 20, 2026 20:17 PM IST

बटाला : किसान नेता सुखजीत सिंह ने किसान संगठनों के बीच जारी विवादों और वरिष्ठ किसान नेताओं की कार्यशैली को लेकर तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कुछ वरिष्ठ किसान नेताओं पर निजी हितों को प्राथमिकता देने, आपसी विवादों को लंबा खींचने और किसान आंदोलनों को कमजोर करने का आरोप लगाया। सुखजीत सिंह ने कहा कि किसान संगठनों में नेतृत्व को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अहंकार का सबसे बड़ा नुकसान किसानों, मजदूरों और किसान आंदोलन की एकता को हो रहा है। सुखजीत सिंह ने समाचार एजेंसी समाचार एजेंसी से खास बातचीत में कहा कि किसान संगठनों के बीच मौजूदा विवाद कोई नया नहीं है। इसी तरह के विवाद पिछले दिल्ली किसान आंदोलन के दौरान भी सामने आए थे। उस आंदोलन के दौरान कुछ नेताओं से गलतियां हुईं और आंदोलन लंबे समय तक चला, लेकिन उसकी सफलता का सबसे बड़ा कारण यह था कि उसमें पूरे देश के लोगों की व्यापक भागीदारी थी। जनता की मजबूत भागीदारी के कारण गलत फैसले लेने वाले नेताओं पर भी दबाव बना और सरकार पर आंदोलन का दबाव बढ़ा। उन्होंने कहा कि दिल्ली आंदोलन में जिस उद्देश्य से किसान गए थे, यानी तीन कृषि कानूनों को रद्द करवाना, उसमें सफलता मिली और सरकार को तीनों कानून वापस लेने पड़े, लेकिन आंदोलन के दौरान जिन नेताओं से गलतियां हुईं, उन्होंने उनसे सबक नहीं लिया और आगे भी वही गलतियां दोहराई जाती रहीं। सुखजीत सिंह ने किसान संगठनों के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान को बड़ी समस्या बताया। उन्होंने कहा कि किसान संगठनों में लगभग हर नेता यह चाहता है कि वह सबसे बड़ा नेता बने और पूरे देश का नेतृत्व उसके हाथ में हो।
उन्होंने कहा कि वे खुद भी इस समस्या का हिस्सा रहे हैं और यह स्वीकार करने में उन्हें कोई संकोच नहीं है। उन्होंने कहा कि किसान नेताओं के बीच एकता कायम करने और सभी संगठनों को एक मंच पर लाने की कई कोशिशें की गईं, लेकिन व्यक्तिगत अहंकार और नेतृत्व की महत्वाकांक्षा के कारण ये प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सके। सुखजीत सिंह ने यहां तक कहा कि कई बार राजनीतिक दलों की तुलना में किसान संगठनों के भीतर अधिक राजनीति देखने को मिलती है। उन्होंने कहा कि किसान संगठनों के बीच एकजुटता की कोशिशें होती रहती हैं, लेकिन जब नेतृत्व और संगठन के वर्चस्व का सवाल आता है तो विवाद फिर खड़े हो जाते हैं।
किसान नेता ने शंभू-खनौरी आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने इस आंदोलन में अंदर रहकर काम किया और लगभग हर महत्वपूर्ण बैठक में शामिल रहे। उन्होंने दावा किया कि इस आंदोलन में किसानों की बहुत बड़ी जीत की संभावना बनी थी। किसान संगठन 13 मांगों को लेकर आंदोलन पर आए थे और बातचीत के दौरान सरकार ने इनमें से करीब 6-7 मांगों को मौखिक रूप से मानने की बात कही थी। सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया था कि यदि आंदोलन समाप्त किया जाता है तो इन मांगों पर कार्रवाई की जाएगी।
सुखजीत सिंह ने कहा कि वे दिल्ली के पिछले किसान आंदोलन में अंदर से शामिल नहीं थे और एक पर्यवेक्षक के तौर पर स्थिति को देखते रहे थे, लेकिन शंभू-खनौरी आंदोलन में उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से काम किया और बैठकों में हिस्सा लिया। उस समय सरकार पर राजनीतिक और चुनावी दबाव भी था, इसलिए किसानों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल करने का अवसर मौजूद था।
सुखजीत सिंह ने कहा कि आंदोलन के दौरान कुछ नेताओं के अहंकार और खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश के कारण किसान संगठनों के हाथ से महत्वपूर्ण अवसर निकल गया। इस स्थिति के लिए केवल दूसरे नेताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, बल्कि इसमें वे खुद को भी जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसान आंदोलन को लगातार कमजोर करने का असर केवल वर्तमान पीढ़ी पर नहीं पड़ेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी बड़े आंदोलन खड़े करने के लिए कई गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है। किसान आंदोलन की एकता को जिस तरह नुकसान पहुंचा है, उससे भविष्य में व्यापक स्तर पर किसानों को एक मंच पर लाना मुश्किल हो सकता है।
उन्होंने किसान संगठनों की बढ़ती संख्या पर भी सवाल उठाए। सुखजीत सिंह ने कहा कि अब बड़ी संख्या में किसान जत्थेबंदियां हैं और लगभग हर संगठन का अपना प्रधान और अपना प्रभाव क्षेत्र है, लेकिन जब सभी संगठनों को एक साझा मंच पर लाने की बात आती है तो एकता मुश्किल हो जाती है।
सुखजीत सिंह ने कहा कि किसी आंदोलन की सफलता केवल संख्या से तय नहीं होती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति अपनी संख्या के आधार पर योगदान देता है, कोई अपनी समझ और रणनीति से, जबकि कोई अन्य तरीके से मदद करता है। एक मजबूत आंदोलन के लिए इन सभी क्षमताओं को एक टीम की तरह साथ लेकर चलना जरूरी है।
किसान संगठनों में जारी मौजूदा विवादों के समाधान को लेकर पूछे गए सवाल पर सुखजीत सिंह ने कहा कि जब तक पुराने नेता अपने पदों पर बने रहेंगे और व्यक्तिगत अहंकार को प्राथमिकता देते रहेंगे, तब तक विवादों का स्थायी समाधान मुश्किल है। हाल में भी बड़े किसान नेताओं की ओर से एक-दूसरे पर संगठनात्मक अनुशासन तोड़ने के आरोप लगाए जा रहे हैं। एक नेता दूसरे पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाता है तो दूसरा भी जवाब में उसी तरह के आरोप लगाता है। इस तरह की बयानबाजी से किसान आंदोलन मजबूत नहीं होता।
उनके मुताबिक, जब नेता एक-दूसरे को नीचे दिखाने और खुद को बड़ा साबित करने में लगे रहेंगे, तब किसानों और मजदूरों के वास्तविक मुद्दे पीछे छूटते जाएंगे। इस स्थिति का सबसे बड़ा नुकसान किसानों और मजदूरों को हो रहा है, क्योंकि उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने के बजाय किसान संगठनों का एक हिस्सा आपसी वर्चस्व की लड़ाई में उलझा हुआ है।
सुखजीत सिंह ने किसान संगठनों के कार्यकर्ताओं और आम किसानों से अपील की कि यदि उनका संगठनात्मक नेतृत्व गलत दिशा में जा रहा है तो उन्हें अपने नेताओं से सवाल करना चाहिए, जिस तरह जनता राजनीतिक दलों के नेताओं को चुनाव के जरिए बदल सकती है, उसी तरह किसान संगठनों के कार्यकर्ताओं को भी गलत नेतृत्व को हटाकर किसी बेहतर और समझदार व्यक्ति को जिम्मेदारी देने की प्रक्रिया अपनानी चाहिए। उन्होंने अपनी ही जत्थेबंदी के कैडर से भी कहा कि यदि उनका नेता गलत फैसले ले रहा है तो संगठन के भीतर उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और उसकी जगह ऐसे व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए जो किसानों के हित में बेहतर काम कर सके।
सुखजीत सिंह ने किसान नेताओं से अपनी उपलब्धियों का हिसाब सार्वजनिक करने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े नेताओं को यह बताना चाहिए कि उन्होंने अब तक किसानों और मजदूरों के लिए क्या-क्या हासिल किया है। उन्होंने कहा कि किसी नेता की पहचान इस बात से नहीं होनी चाहिए कि वह कितना बड़ा पद रखता है या कितने लोग उसके साथ हैं, बल्कि इस बात से होनी चाहिए कि उसने किसानों के लिए वास्तविक रूप से क्या हासिल किया है। उन्होंने पटियाला मोर्चे का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां किसान नेताओं ने करीब 10 दिन तक व्रत किया था। उस आंदोलन में कई मांगें थीं और बिजली बोर्ड से जुड़े मुद्दों को लेकर कुछ ही लोग धरने पर बैठे थे, लेकिन बातचीत और संघर्ष के बाद सरकार ने सात मांगों को मान लिया।
सुखजीत सिंह ने कहा कि आज उन मांगों का लाभ किसानों और आम लोगों को मिल रहा है। उनके मुताबिक, यही किसी आंदोलन की वास्तविक सफलता है। उन्होंने कहा कि नेता को यह नहीं देखना चाहिए कि आंदोलन के बाद उसका कद कितना बढ़ा या उसे व्यक्तिगत तौर पर कितना फायदा हुआ, बल्कि यह देखना चाहिए कि किसानों की झोली में क्या आया।
सुखजीत सिंह ने आगे कहा कि किसी भी आंदोलन के नेतृत्व की असली परीक्षा सही समय पर सही फैसला लेने में होती है। यदि किसी समय सरकार किसानों की मांगों को मानने के लिए तैयार हो और आंदोलन को आगे बढ़ाने से किसानों को नुकसान होने की आशंका हो तो नेतृत्व को परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना चाहिए। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, अहंकार और संगठनात्मक वर्चस्व से ऊपर उठकर किसानों के हितों को प्राथमिकता देना जरूरी है। किसान आंदोलन तभी मजबूत हो सकता है जब अलग-अलग संगठन अपने-अपने हितों से ऊपर उठकर एक साझा मंच पर आएं और यह तय करें कि लक्ष्य किसी एक नेता को बड़ा बनाना नहीं, बल्कि किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए ठोस उपलब्धियां हासिल करना है।

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