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राष्ट्रीय

सावन माह में विशेष: बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, यहां भगवान शिव की पूजा एक दिव्य चिकित्सक के रूप में होती है

Updated on Monday, August 17, 2026 13:40 PM IST

‘सावन माह में विशेष’ की कड़ी में हम आपको सावन (श्रावण) के प्रारंभ से भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। यह शिव शक्ति के वो 12 पवित्र स्थल हैं, जहां भगवान शिव स्वयंभू प्रकट हुए। इससे पहले, आपने प्रथम सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन, तीसरे महाकालेश्वर, चौथे ओंकारेश्वर, पांचवें केदारेश्वर और छठें भीमाशंकर, सातवें विश्वेश्वर, आठवें त्र्यंबकेश्‍वर ज्योतिर्लिंग के बारे में पढ़ा।

आज आपको सावन के तीसरे सोमवार के दिन आपको बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में अवगत करा रहे हैं। झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम, भगवान शिव के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इस मंदिर को बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से भी जाना जाता है, जहां भगवान शिव की पूजा एक दिव्य चिकित्सक (वैद्य) के रूप में की जाती है।

देवघर राज्य की राजधानी रांची से लगभग 243 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह झारखंड का सबसे पवित्र स्थान है।

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति

एक पवित्र कथा के अनुसार, रावण ने इस स्थान पर भगवान शिव को अपने दस सिर अर्पित किए थे। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर, शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और रावण के घावों को ठीक किया, जिससे उन्हें ‘बैद्यनाथ’—यानी चिकित्सकों के स्वामी का नाम मिला।

एक और मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के सबसे बड़े भक्तों में से एक रावण ने उनसे लंका को अपना घर बनाने का अनुरोध किया था। भगवान ऐसा तो नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने कहा कि शिवलिंग का होना उनकी उपस्थिति के समान ही होगा। उन्होंने यह शर्त रखी कि शिवलिंग को ले जाते समय रावण उसे कहीं भी नीचे न रखे। अगर वह ऐसा करता, तो जिस जगह पर वह उसे रखता, वही शिवलिंग का स्थान बन जाता।

जब रावण उसे लंका ले जा रहा था, तो देवताओं को रावण के राज्य में उस लिंग के होने के नतीजों से डर लगा और उन्होंने जल के देवता, भगवान वरुण से उसकी यात्रा में बाधा डालने का अनुरोध किया। वरुण ने रावण के पेट में प्रवेश किया, जिससे राक्षस राजा को मल-त्याग की इच्छा हुई। वह ज़मीन पर उतरे और लिंग एक ब्राह्मण (वेश बदले हुए भगवान विष्णु) को सौंपकर उसे पकड़े रहने के लिए कहा।

जैसे ही रावण शौच के लिए गया, भगवान विष्णु ने लिंग को ज़मीन पर रख दिया और गायब हो गए। जब रावण वापस आया, तो उसे एहसास हुआ कि उसे धोखा दिया गया। रावण ने लिंग को पुनः उठाने की कोशिश की, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सका। शिवलिंग जमीन से जुड़ चुका था। रावण ने वहीं उसे नमन किया। माना जाता है कि यह जगह देवघर है।

यह मंदिर एक शक्तिपीठ भी है। जब भगवान शिव की पहली पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ के बाद आत्मदाह कर लिया, तो शोक में डूबे भगवान शिव उनके शरीर को लेकर दुनिया भर में घूमते रहे। भगवान विष्णु ने उस शरीर के 52 टुकड़े कर दिए। कहा जाता है कि उनका हृदय देवघर में गिरा था, जिससे यह एक शक्तिपीठ बन गया।

बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर

देवघर में 22 मंदिरों का एक सुंदर परिसर है, जिनमें से सबसे बड़ा और सबसे ऊंचा मंदिर 72 फ़ीट का है। मुख्य मंदिर में एक पिरामिड के आकार का शिखर है, जिस पर सोने के तीन कलश पास-पास लगे हुए हैं। ये कलश गिद्धौर के महाराजा, राजा पूरन सिंह ने भेंट किए थे। इसमें त्रिशूल के आकार के पंचशूल और आठ पंखुड़ियों वाला कमल के आकार का रत्न भी है, जिसे चंद्रकांत मणि कहा जाता है। मंदिर का मौजूदा ढांचा मध्यकालीन दौर का है, जिसमें सदियों से अलग-अलग शासकों का योगदान रहा है।

बाबा बैद्यनाथ मंदिर वेबसाइट के अनुसार, अब मंदिर ट्रस्ट इस परिसर का प्रबंधन करता है और इसके संरक्षण तथा तीर्थयात्रियों की भलाई का ध्यान रखता है। यह मंदिर परिसर एक बड़े इलाके में फैला हुआ है और इसकी शानदार बनावट प्राचीन भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।

मुख्य मंदिर के चारों ओर अलग-अलग देवी-देवताओं को समर्पित 22 छोटे मंदिर हैं, जिनमें से हर एक का अपना महत्व और इतिहास है। यहां आपको पार्वती, गणेश, ब्रह्मा, कालभैरव, हनुमान, सरस्वती, सूर्य, राम-लक्ष्मण-जानकी, गंगा, काली, अन्नपूर्णा और लक्ष्मी-नारायण के मंदिर देखने को मिलेंगे। मां पार्वती का मंदिर शिव मंदिर से लाल पवित्र धागों से बंधा हुआ है। वहीं, देवघर से लगभग 43 किलोमीटर दूर बासुकीनाथ में पूजा-अर्चना करने के साथ ही यह तीर्थयात्रा पूरी मानी जाती है।

मुख्य पूजा और कार्यक्रम

हिंदू महीने ‘सावन’ में लगने वाला सालाना ‘श्रावणी मेला’ इस मंदिर का सबसे बड़ा तीर्थ-आयोजन है। अपनी अटूट आस्था और भक्ति के प्रतीक के रूप में, भारत और विदेशों से श्रद्धालु सुल्तानगंज से देवघर तक 100 किलोमीटर से ज़्यादा की दूरी नंगे पैर तय करके ज्योतिर्लिंग पर पवित्र गंगाजल चढ़ाने के लिए देवघर आते हैं। यह ऐसा नजारा होता है, जो शिव के भक्तों की अटूट श्रद्धा को दर्शाता है।

 

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