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राष्ट्रीय

हंगामे के बीच सीमित रहा संसद के मानसून सत्र का कामकाज

Updated on Friday, August 14, 2026 12:18 PM IST

संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है, जहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि देश की दिशा और दशा तय करने वाले कानूनों और नीतियों पर चर्चा करते हैं। सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, जनहित के मुद्दे उठाए जाते हैं और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर समाधान तलाशने की कोशिश होती है। लेकिन जब चर्चा की जगह हंगामा और संवाद की जगह गतिरोध हावी हो जाए, तो सवाल उठता है कि जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता जनसरोकार हैं या दलगत राजनीति? संसद का मानसून सत्र इसी सवाल को गंभीरता से सामने रखता है।

25 दिनों में 19 बैठकें, कामकाज सीमित
मानसून सत्र 25 दिनों तक चला और दोनों सदनों की कुल 19 बैठकें हुईं। हालांकि, सत्र के दौरान कामकाज का बड़ा हिस्सा हंगामे और व्यवधान की भेंट चढ़ गया। लोकसभा की उत्पादकता करीब 19% रही, जबकि राज्यसभा में करीब 39% कामकाज हुआ।

लोकसभा में 114 घंटे में सिर्फ 17 घंटे 30 मिनट काम
मानसून सत्र के दौरान लोकसभा की 19 बैठकें हुईं। सामान्य तौर पर एक दिन में करीब 6 घंटे प्रभावी कार्यवाही के समय के हिसाब से 19 बैठकों में लगभग 114 घंटे काम होना था। लेकिन लोकसभा में करीब 17 घंटे 30 मिनट ही प्रभावी कामकाज हो सका। यानी करीब 96 घंटे 30 मिनट का निर्धारित कार्य समय उपयोग में नहीं आ पाया।

राज्यसभा में भी करीब 76 घंटे का समय कम
राज्यसभा की स्थिति भी बहुत अलग नहीं रही। यहां करीब 114 घंटे की कार्यवाही होनी थी, लेकिन लगभग 37 घंटे 24 मिनट ही काम हो सका। इस तरह करीब 76 घंटे 36 मिनट का निर्धारित समय प्रभावी कामकाज में इस्तेमाल नहीं हो पाया।

सवाल सिर्फ समय का नहीं, जनहित का है
संसद में बर्बाद हुआ हर घंटा केवल सदन की कार्यवाही का नुकसान नहीं है। यह उस जनता के समय और संसाधनों से भी जुड़ा सवाल है, जो अपने प्रतिनिधियों को इस उम्मीद से चुनती है कि वे उसकी आवाज संसद तक पहुंचाएंगे। प्रश्नकाल सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। वहीं, शून्यकाल में सांसद तत्काल जनहित से जुड़े मुद्दे उठाते हैं। लगातार व्यवधान होने पर इन महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रियाओं का उद्देश्य प्रभावित होता है।

मानसून सत्र सबसे कम कामकाज वाला नहीं
हालांकि, पूरी तस्वीर को केवल गतिरोध के नजरिए से देखना भी सही नहीं होगा। मानसून सत्र को संसद के इतिहास का सबसे कम कामकाज वाला सत्र कहना उचित नहीं है। 2009 के बाद उपलब्ध आंकड़ों में इससे कम उत्पादकता वाले कई सत्र रहे हैं। दिसंबर 2010 का शीतकालीन सत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब लोकसभा में निर्धारित समय का केवल करीब 5% और राज्यसभा में लगभग 2% ही कामकाज हो सका था।

सदन चला तो हुई महत्वपूर्ण चर्चा
मानसून सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पेश और पारित किए गए। इनमें टैक्स, बैंकिंग, खनन, ट्रिब्यूनल, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर रोक, केरल का नाम बदलने और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या से जुड़े विषय शामिल रहे। 28 और 29 जुलाई को लोकसभा में अपेक्षाकृत सामान्य माहौल देखने को मिला। लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक, 2026 पर करीब 10 घंटे तक चर्चा हुई। यह बताता है कि जब सदन व्यवस्थित तरीके से चलता है, तो गंभीर और विस्तृत बहस के लिए पर्याप्त गुंजाइश होती है।

FCRA संशोधन विधेयक JPC को भेजने का प्रस्ताव
12 अगस्त 2026 को विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA संशोधन विधेयक, 2026 को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजने का प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित किया गया। यह भी इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संसदीय प्रक्रिया के जरिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर आगे बढ़ा जा सकता है।

संसद चलाना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं
संसदीय लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों की आलोचना करना और जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाना है। वहीं, सत्तापक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष के सवालों और आपत्तियों का जवाब दे और सदन में चर्चा का माहौल बनाए। विरोध लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन लगातार व्यवधान लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। असहमति हो सकती है, तीखी बहस भी हो सकती है, लेकिन उसका अंतिम मंच संसद ही है। अगर बहस की जगह हंगामा प्राथमिक माध्यम बन जाए, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ता है।

जनता सांसदों को किस लिए संसद भेजती है?
सांसदों को जनता सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, उद्योग और अपने क्षेत्र से जुड़े तमाम सवालों की आवाज बनने के लिए चुनती है। इसलिए संसद में बिताया गया हर मिनट महत्वपूर्ण है। कानून बनाने के लिए चर्चा चाहिए, सरकार से जवाब मांगने के लिए प्रश्न चाहिए और देश की दिशा तय करने के लिए संवाद चाहिए।

सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। लेकिन मतभेदों के बावजूद सदन चलाना, चर्चा करना और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देना दोनों पक्षों की साझा जिम्मेदारी है। संसद जब चलती है, तो सिर्फ सदन की कार्यवाही नहीं चलती, बल्कि लोकतंत्र आगे बढ़ता है, नीतियां बनती हैं और देश के भविष्य की दिशा तय होती है।

 

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