Wednesday, 28 October 2026
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ग्लोबल साउथ की आवाज बना भारत, ब्रिक्स को विकास का मंच बनाने की कोशिश: प्रोफेसर स्वर्ण सिंह

Updated on Tuesday, September 15, 2026 14:23 PM IST

नई दिल्ली: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने सिर्फ घोषणापत्र तक सीमित न रहकर बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाई है। जवाहर लाल विश्वविध्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी सफलता ईरान के राष्ट्रपति की मेजबानी और ईरान-यूएई के बीच टकराव को कम कर दोनों नेताओं को बातचीत की मेज पर लाना रहा। वहीं, दिल्ली डिक्लेरेशन में विकास, आतंकवाद और ग्लोबल साउथ को लेकर भारत के स्पष्ट रुख को दुनिया के सामने रखा गया है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर कहा कि घोषणापत्र से इतर भारत का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ईरान के राष्ट्रपति की मेजबानी रहा। प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी बॉडी लैंग्वेज चर्चा का विषय रही। वे एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष थे जो दिल्ली आए और राष्ट्रपति से भी उनकी मुलाकात हुई।

उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी बात यह रही कि ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच टकराव के कारण मई में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में सहमति नहीं बन पाई थी, लेकिन इस शिखर सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति और यूएई के क्राउन प्रिंस आमने-सामने बैठकर बातचीत करते नजर आए। यह भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता है। खाड़ी क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखना सभी के हित में है, होर्मुज स्ट्रेट खुला रहना चाहिए और ओमान-ईरान मिलकर इसका समाधान निकाल सकते हैं, इस पर भी चर्चा हुई।

प्रोफेसर सिंह ने कहा कि भू-राजनीति को लेकर घोषणापत्र में कोई सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन भारत ने अपने बयानों में स्पष्ट संदेश दिया है। प्रधानमंत्री मोदी रूस के राष्ट्रपति से कई मौकों पर कह चुके हैं कि यह युग युद्ध का नहीं है। हाल में बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में भी उन्होंने कहा था कि यह अंतहीन युद्ध समाप्त होना चाहिए, क्योंकि इसका प्रभाव पूरी मानवता पर पड़ रहा है। भारत रूस के साथ मध्यस्थता को लेकर भी खुलकर बात कर रहा है।

जेएनयू के प्रोफेसर ने कहा कि कुल मिलाकर इस सम्मेलन में राजनीति और भू-राजनीति पर जोर देने के बजाय आर्थिक और तकनीकी साझेदारी पर ध्यान केंद्रित किया गया। यही कारण है कि भारत की ओर से शेरपा के रूप में विदेश मंत्रालय में आर्थिक संबंध सचिव को नियुक्त किया गया था।

उन्होंने कहा कि यही रुझान इस साल की थीम में भी दिखता है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की थीम ब्रिक्स शब्द के अक्षरों से ही बनाई गई है, जिसमें बिल्डिंग, रिजिलियंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी पर जोर दिया गया है। इससे साफ है कि ध्यान राजनीति पर नहीं, बल्कि विकास पर है। कोशिश यह है कि दुनिया ब्रिक्स को विकास के मंच के रूप में देखे। खासकर पश्चिमी देशों में यह धारणा है कि ब्रिक्स पश्चिमी देशों के खिलाफ टकराव का मंच है और भू-राजनीति पर केंद्रित है। इसी पहचान को बदलकर दिल्ली घोषणापत्र और पूरे शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स को विकास-केंद्रित मंच के रूप में पेश करने का प्रयास किया गया है।

प्रोफेसर सिंह ने कहा कि घोषणापत्र में आतंकवाद का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। पूरे चार पैराग्राफ में आतंकवाद पर चर्चा की गई है, जिसमें जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले का भी विस्तार से जिक्र है। आतंकवाद का मुद्दा ब्रिक्स देशों के बीच आम सहमति का विषय बना है।

उन्होंने आगे कहा कि अब देखना यह होगा कि आने वाले तीन महीनों में जो प्रस्ताव रखे गए हैं, वे जमीन पर कैसे उतरते हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार करीब 50 ठोस प्रस्ताव हैं, जिनके परिणाम आने वाले समय में दिखेंगे। अगले तीन महीनों में कई बैठकें होने वाली हैं, जो इन प्रस्तावों को आगे बढ़ाने का अवसर देंगी। सवाल यह है कि क्या दिल्ली घोषणापत्र में शामिल प्रस्तावों को अमल में लाया जा सकेगा।

प्रोफेसर सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री ने कहा है कि भारत की सोच केवल सर्वसम्मति से निर्णय लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन निर्णयों को अंतिम परिणाम तक पहुंचाना भी हमारी जिम्मेदारी है। ब्रिक्स की सोच यह नहीं है कि कुछ परियोजनाएं या मंच बनाकर ग्लोबल साउथ को सहायता दी जाए, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों को साथ लेकर सोचा जाए कि किस तरह की परियोजनाएं और प्रस्ताव होने चाहिए। इसी वजह से भारत खुद को ग्लोबल साउथ का नेता नहीं, बल्कि उसकी आवाज कहता है।

 

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