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हरियाणा

2% आबादी, 33% मेडल...खिलाड़ियों ने फिर साबित किया अपना लोहा, जानिए कैसे भारत का 'खेल पावरहाउस' बना Haryana

Updated on Friday, August 07, 2026 19:58 PM IST

चंडीगढ़ : हरियाणा एक बार फिर यह साबित कर रहा है कि खेलों में सफलता केवल बड़ी आबादी या विशाल संसाधनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति, बेहतर खेल नीति और खिलाड़ियों के समर्पण से हासिल होती है। देश की कुल आबादी में केवल लगभग दो प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला हरियाणा वर्षों से भारत के लिए खेलों में सबसे बड़ा योगदान देने वाला राज्य बना हुआ है। ओलंपिक, पैरालिंपिक, एशियाई खेल, राष्ट्रमंडल खेल और विश्व चैंपियनशिप जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत को मिलने वाले लगभग एक-तिहाई पदकों पर हरियाणा के खिलाड़ियों की छाप रही है। यही कारण है कि आज हरियाणा को पूरे देश में "खेलों का पावर हाउस" कहा जाता है।

हाल ही में संपन्न राष्ट्रमंडल खेलों में भी हरियाणा के खिलाड़ियों ने अपनी इस प्रतिष्ठा को कायम रखा। भारत को मिले कुल 39 पदकों में से 11 पदक हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीतकर एक बार फिर साबित कर दिया कि देश की खेल उपलब्धियों में इस प्रदेश का योगदान सबसे अधिक है। सबसे बड़ी बात यह रही कि भारत को मिले 13 स्वर्ण पदकों में से सात स्वर्ण पदक अकेले हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीते। इनमें भी भिवानी की बेटियों ने पांच स्वर्ण पदक जीतकर न केवल प्रदेश, बल्कि पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। एक बार फिर लोगों की जुबान पर वही कहावत आ गई—"म्हारी छोरियां छोरों से कम सैं के।"

भिवानी बना देश की मुक्केबाजी की राजधानी
हरियाणा की खेल संस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण भिवानी है, जिसे देश ही नहीं बल्कि दुनिया में "मिनी क्यूबा" के नाम से जाना जाता है। यहां की मुक्केबाजी अकादमियों ने देश को अनेक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं। इस बार भी ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में भिवानी के मुक्केबाजों ने स्वर्णिम इतिहास रचा।
सचिन सिवाच, साक्षी चौधरी ढांडा, प्रीति पंवार, प्रिया घणघस और जैस्मीन लांबोरिया ने स्वर्ण पदक जीतकर हरियाणा की मुक्केबाजी परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हिसार के अंकुश पंघाल ने भी स्वर्ण पदक जीतकर इस सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वहीं हिसार के नरेंद्र बेरवाल ने रजत पदक हासिल किया।

एथलेटिक्स और पैरा खेलों में भी शानदार प्रदर्शन
हरियाणा केवल मुक्केबाजी या कुश्ती तक सीमित नहीं रहा। एथलेटिक्स और पैरा स्पर्धाओं में भी प्रदेश के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया।
झज्जर की शर्मीला ने महिला शॉटपुट (एफ-57) में स्वर्ण पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। पानीपत के स्टार भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने रजत पदक हासिल किया, जबकि भिवानी के यशवीर ने कांस्य पदक अपने नाम किया। भिवानी की सीमा ने डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। महिला शॉटपुट और डिस्कस थ्रो में भारत को पहली बार पदक दिलाने का श्रेय भी हरियाणा के खिलाड़ियों को गया।

कम पदक, लेकिन वजह प्रदर्शन नहीं
पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि इस बार हरियाणा के पदकों की संख्या कम हुई है, लेकिन इसके पीछे खिलाड़ियों का प्रदर्शन नहीं बल्कि राष्ट्रमंडल खेलों में कई प्रमुख खेलों को हटाया जाना है।

बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल-2022 में भारत ने 61 पदक जीते थे, जिनमें हरियाणा के खिलाड़ियों ने अकेले 20 पदक अपने नाम किए थे। इस बार ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों से कुश्ती, हॉकी, निशानेबाजी, क्रिकेट, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, स्क्वैश, रग्बी सेवेंस, डाइविंग, बीच वॉलीबॉल और ट्रायथलॉन जैसे खेलों को बाहर कर दिया गया।
केवल कुश्ती में ही वर्ष 2022 में हरियाणा ने 11 पदक जीते थे। इसके अलावा क्रिकेट में शैफाली वर्मा तथा पुरुष और महिला हॉकी टीमों के पदकों सहित लगभग 14 पदकों के अवसर इस बार स्वतः समाप्त हो गए। ऐसे में 11 पदक जीतना हरियाणा के खिलाड़ियों की क्षमता का ही प्रमाण है।

खेल नीति बनी सफलता की सबसे बड़ी ताकत
हरियाणा की सफलता के पीछे सबसे बड़ा आधार उसकी दूरदर्शी खेल नीति है। "पदक लाओ-इनाम पाओ" की नीति ने खिलाड़ियों में नई ऊर्जा का संचार किया है। यहां खिलाड़ी जानते हैं कि यदि वे देश के लिए पदक जीतेंगे तो सरकार न केवल उनका सम्मान करेगी बल्कि आर्थिक रूप से भी उन्हें पूरी सुरक्षा प्रदान करेगी।
प्रदेश सरकार ओलंपिक और पैरालिंपिक स्वर्ण पदक विजेताओं को छह करोड़ रुपये, रजत पदक पर चार करोड़ रुपये और कांस्य पदक पर ढाई करोड़ रुपये का पुरस्कार देती है।
इसी प्रकार एशियाई एवं पैरा एशियाई खेलों के स्वर्ण विजेताओं को तीन करोड़, रजत विजेताओं को डेढ़ करोड़ तथा कांस्य विजेताओं को 75 लाख रुपये प्रदान किए जाते हैं। राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने पर डेढ़ करोड़, रजत पर 75 लाख और कांस्य पदक पर 50 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी जाती है।

खिलाड़ियों को हर स्तर पर सरकारी सहयोग
हरियाणा सरकार केवल पदक जीतने के बाद ही खिलाड़ियों को सम्मानित नहीं करती, बल्कि तैयारी के दौरान भी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराती है।
ओलंपिक और पैरालिंपिक के लिए क्वालीफाई करते ही खिलाड़ियों को पांच लाख रुपये अग्रिम दिए जाते हैं ताकि वे अपनी तैयारी बेहतर ढंग से कर सकें। एशियाई, पैरा एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए क्वालीफाई करने वाले खिलाड़ियों को ढाई लाख रुपये की अग्रिम सहायता दी जाती है।
अर्जुन पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार और तेनजिंग नोर्गे पुरस्कार प्राप्त खिलाड़ियों को प्रतिमाह 20 हजार रुपये सम्मान राशि दी जाती है, जबकि भीम अवार्डियों को पांच हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं।

दो हजार से अधिक खेल नर्सरियां तैयार कर रहीं भविष्य
हरियाणा अब केवल वर्तमान पर नहीं बल्कि भविष्य की तैयारी भी कर रहा है। प्रदेश में दो हजार से अधिक खेल नर्सरियां संचालित की जा रही हैं, जहां छोटी उम्र से ही प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

इन नर्सरियों का उद्देश्य वर्ष 2036 के ओलंपिक में भारत को अधिकतम पदक दिलाना है। आधुनिक खेल विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षक और बेहतर आधारभूत सुविधाओं के माध्यम से खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

बेटियों ने बदली खेलों की तस्वीर
हरियाणा कभी बेटियों के प्रति सामाजिक चुनौतियों के कारण चर्चा में रहता था, लेकिन आज वही प्रदेश महिला खिलाड़ियों की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है।
साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, बबीता फोगाट, गीता फोगाट, मनु भाकर, शैफाली वर्मा और अब भिवानी की नई पीढ़ी की मुक्केबाज बेटियों ने साबित कर दिया है कि अवसर मिलने पर हरियाणा की बेटियां दुनिया जीत सकती हैं। सरकार भी महिला खिलाड़ियों को विशेष छात्रवृत्ति, निःशुल्क प्रशिक्षण और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध करा रही है।

सरकार का नया रोडमैप
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का कहना है कि प्रदेश सरकार खेलों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम कर रही है। सरकार उत्कृष्ट खिलाड़ियों के लिए 550 नए पद सृजित कर चुकी है। तृतीय श्रेणी की नौकरियों में तीन प्रतिशत और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में दस प्रतिशत आरक्षण खिलाड़ियों को दिया गया है।

आवासीय खेल अकादमियों में खिलाड़ियों की डाइट राशि बढ़ाकर 500 रुपये प्रतिदिन कर दी गई है। आठ से 14 वर्ष तक के खिलाड़ियों को दो हजार रुपये तथा 19 वर्ष तक के खिलाड़ियों को तीन हजार रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति देने की व्यवस्था की गई है। अब तक 225 खिलाड़ियों को प्रथम और द्वितीय श्रेणी की सरकारी नौकरियां मिल चुकी हैं।
सरकार खिलाड़ियों को 20 लाख रुपये तक का मेडिकल कवरेज भी उपलब्ध करा रही है। साथ ही ओलंपिक पदक विजेताओं को अपने गृह जिले में खेल अकादमी स्थापित करने के लिए पांच करोड़ रुपये तक का ऋण और उस पर दो प्रतिशत ब्याज सब्सिडी देने की योजना भी लागू की गई है।

हरियाणा का मॉडल पूरे देश के लिए प्रेरणा
हरियाणा की खेल यात्रा केवल पदकों की कहानी नहीं है, बल्कि यह दूरदर्शी नीतियों, मजबूत इच्छाशक्ति, खेल संस्कृति और समाज के सामूहिक सहयोग का परिणाम है। जिस राज्य की आबादी देश की कुल जनसंख्या का केवल दो प्रतिशत हो, उसका अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत के एक-तिहाई पदकों पर अधिकार होना अपने आप में असाधारण उपलब्धि है।

यदि प्रदेश इसी तरह खेल अधोसंरचना, खिलाड़ियों के सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और नई प्रतिभाओं के विकास पर ध्यान देता रहा तो आने वाले वर्षों में हरियाणा केवल भारत का ही नहीं बल्कि विश्व खेल मानचित्र पर भी अपनी अलग पहचान और मजबूत करेगा। आज हरियाणा केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की खेल शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।

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